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Thursday, 6 March 2014

एक हाइकुनुमा कविता





होती बिटिया
चिड़ियों के जैसी
बाबुल घर

(चित्र: गूगल से साभार)




एक हाइकुनुमा कविता






न हो हताश
डूबकर उगता
फ़िर से सूर्य
***

सभी मित्रों को सुप्रभात :-))




(चित्र: गूगल से साभार)

Wednesday, 5 March 2014

हुई सुबह



बजा अलार्म
छोड़ो अब बिस्तर
हुई सुबह

(चित्र: गूगल से साभार)



सोचो तो ज़रा
देखे कभी तुमने
शब्दों के पंख
***

लूट ले गए
लो सारी महफ़िल
शब्द तुम्हारे       

***


(चित्र: गूगल से साभार)

Sunday, 2 March 2014


                        आते वसंत
                      हर एक उम्र में
                                                     न करो दुःख   


(चित्र: गूगल से साभार)




भागता चाँद 
गहरायी-सी रात 
पसरा मौन 



(चित्र: गूगल से साभार)




चला सूरज
समेटकर ज्योति
अपने घर 



(चित्र: गूगल से साभार)

Sunday, 16 February 2014



14 फरवरी को लोकपाल बिल के मुद्दे पर दिल्ली विधानसभा में खूब हंगामा हुआ और तत्कालीन मुख्यमंत्री (दिल्ली) ने अपना इस्तीफ़ा दे दिया...एक बार फिर से आन्दोलन/स्वतंत्रता की दूसरी लड़ाई/भ्रष्टाचार/एक दूसरे को पछाड़ने/उखाड़ फेंकने के स्वर तेज हो उठे हैं...इसी परिवेश पर चंद हाइकु हमारी ओर से:

बदली हवा
नहीं चलेगी अब
वो राजनीति
      *
तोड़ने होंगे
वर्तमान में बने
सत्ता के किले
      *
सोचता मन
कैसा ये जनतंत्र
त्रस्त है जन

      *

(चित्र: गूगल से साभार)



13 फरवरी को भारतीय लोकतंत्र का मंदिर कहे जाने वाली संसद में इसी मंदिर के कुछ माननीय भक्तों (नेताओं) ने काली मिर्च का स्प्रे करने का पुनीत कार्य संपन्न किया, जिससे कुछ भक्तों (नेताओं) को तुरंत अस्पताल की शरण में जाना पड़ा ! यह नज़ारा पूरी दुनिया ने देखा, हम भारतवासी फिर से एक बार शर्मसार हुए...!  इसी परिवेश पर चंद हाइकु हमारी ओर से:

खेलते कुश्ती
संसद के मैदान
नेता महान
      *
कैसे ये नेता
उड़ाते जो मखौल
गणतंत्र का
      *
जो कुछ हुआ
जनता है शर्मसार
मस्त हैं नेता
      *

(चित्र: गूगल से साभार)



Thursday, 26 December 2013

आज के दौर पर 6 हाइकू

                                  
  
     1
हो चला अंत   
संवेदनाएं शून्य
इच्छा अनंत 

      2
यूँ मिटा प्यार
खुद में ही सिमटे
सारे त्यौहार

     3
इस दौर में
खुद में संकुचित
हो गए लोग
         
      4
बड़ा आश्चर्य
गला काटते यहाँ
अपने लोग

      5
हम तो रहे
अपनों के बीच भी
अज़नबी-से

      6
ना रहा अब
कोई त्यौहार खास
मन उदास
       *

Friday, 23 August 2013

मानव तुम ना हुए सभ्य



आज भी कई
होते चीरहरण
कहाँ हो कृष्ण
                ***
रही चीखती
क्यों नहीं कोई आया
उसे बचाने
                ***
निर्ममता से
तार-तार इज्ज़त
करें वहशी
                ***
हुआ वहशी
खो दी इंसानियत
क्यों आदमी ने
                ***
तमाम भय
असुरक्षित हम
कैसा विकास
                ***
कैसी ये व्यथा
क्यों रहे जानवर
पढ़-लिख के
                ***
वामा होने की
कितनी ही दामिनी
भोगतीं सज़ा
                ***
बेबस नारी
अजीब-सा माहौल
कैसा मखौल
                ***
ओ रे मानव
कई युग बदले
हुआ ना सभ्य
                ***

दामिनी की स्मृति में-1


जहाँ कहीं भी
हो नारी का सम्मान
बसें देवता
                ***
अजीब व्याख्या
करें चीरहरण
पूजते नारी
                ***
बदले युग
मानव तुम कभी
हुए ना सभ्य
                ***